पर्यावरण और मानव

प्रत्येक व्यक्ति को कुछ आचार विचार का हर रोज अथवा कभी कभी पालन करना चाहिए ।इनमें कई तरह की साधनाएं सम्मिलित हैं ।यह प्रक्रिया हमें याद दिलाती है कि प्राकृति हर रूप में पूजनीय है शोषणीय नहीं ।इससे प्रकृति के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है ।इस तरह गाय,बैल,हाथी, घोड़ा, सपॆ, की भी पूजा की जाती है ।पक्षी पेड़ पौधे केला पीपल, तुलसी जैसी वनस्पति हमारी पूज्य बन गयी है ।हमारी यह श्रद्धा प्राणी मात्र तक ही सीमित नहीं हैं ,अन्य स्वरूप में प्रकृति, जल,पृथ्वी, पहाड़, नदी, औजार, उपकरण, वाहन,चूल्हा बतॆन आदि प्रकारो में हम प्रकृति को पूज्य मानते हैं जब उपभोगवाद संतुष्टि का लक्ष्य बन गया तो लाखों उत्पाद की सृष्टि की जाने लगी ।इसके लिए प्रकृतिक संसाधनों के शोषण का सिलसिला तेज हो गया ।आज हम इस स्थित में पहुंचेहैं कि जिन प्रकृतिक संसाधनों का पुनर्जन्म संभव है या नहीं वे सब सांसत में है ।उत्पादन के समय प्रदूषण का फैलाव हो रहा है ।संसाधनों का जजॆर होना और प्रदूषण ये पर्यावरण संकट के दो खास पहलू हैं।

About the author

Kumud Poorvi

कुमुद इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पुरा छात्रा हैं। एम.एड. की शैक्षिक योग्यता। अनेक पुस्तको
एवं लेखों का प्रणयन। पर्यावरणीय जागरूकता एवं ग्रामीण क्षेत्र मे गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा
के प्रचार में रत।

View all posts

10 Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *