अपने यात्रापथ में संचरणशील मानव जिस सत्य का दर्शन करता है ।जिस सत्य का प्रयोग करता है वही उसका यथार्थ स्वरूप है ।वह अपने देश काल की सीमाओ से सीमित पूणॆता की केवल कल्पना कर पाता है उसकी उपलब्धि नहीं ।साथ ही मानवगत दुर्बलताएं तथा उसके परिणाम भी उसके साथ रहते हैं ।इस प्रकार वह अपने जीवन में एक प्रकार की त्रुटि या अभाव का अनुभव करता है ।आर्दश इन अभावों को पूर्ण करने का प्रयत्न करता है ।फलतः जीवन में एक गति विशेष उत्पन्न होती है जो अपनी मोहकला में आकर्षण में एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करती है और मानव उसो वातावरण में पहुंच कर अपने अभावों को जीता है ।अतएव जीवन हेतु आदशॆ उतना ही आवश्यक है जितना कि यथार्थ ।जीवन की सार्थकता यथार्थ और आदर्श के मिश्रण से ही संभव है ।मनुष्य और उसके आसपास की चीजें पर्यावरण कहलाताहैं जो उसके अस्तित्व के लिए जरूरी है ।विकास प्राकृतिक संसाधनों से होता है और इन्हीं उपादानो से हमारा मनोरम पर्यावरण बनता है ।पर्यावरण के भौतिक तथा जैविक दो तत्व है।ये एक दूसरे को प्रभावित करते हैं ।भौतिक पर्यावरण के बदलने पर जैविक पर्यावरण भी बदल जाता है ।इस प्रकार यह गतिशील है ।इस भौतिक तथा जैविक पर्यावरण के बीच की पारस्परिक क्रिया पारिसिथतिकी कहलाती है ।मनुष्य और उसके आसपास की चीजें पर्यावरण कहलाताहैं जो उसके अस्तित्व के लिए जरूरी है ।विकास प्राकृतिक संसाधनों से होता है और इन्हीं उपादानो से हमारा मनोरम पर्यावरण बनता है ।पर्यावरण के भौतिक तथा जैविक दो तत्व है।ये एक दूसरे को प्रभावित करते हैं ।भौतिक पर्यावरण के बदलने पर जैविक पर्यावरण भी बदल जाता है ।इस प्रकार यह गतिशील है ।इस भौतिक तथा जैविक पर्यावरण के बीच की पारस्परिक क्रिया पारिसिथतिकी कहलाती है ।

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