बौद्धिक क्षमता के उत्तरोतर विकास एवं सभ्यता के क्रमिक सोपान बढ़ने के साथ साथ प्रकृति पर मानव का वचॆस्व बढ़ता गया ।फिर शुरू हुआ शहरीकरण और औद्योगिकरण की क्रांति ।संसाधनों का अति दोहन से प्रकृति में असंतुलन पैदा हो गया ।आरंभ में यह औद्योगिक रूप से विकसित देशों में था किंतु अब सभी देशों में ।असंतुलन से जुड़ी समस्याएं- जंगलों का घटना, वन्य जीवों का विनाश, भूमि अपदॆन, रेगिस्तान विस्तार, जल,वायु और मृदा प्रदूषण लवणियता में वृद्धि जैसी पर्यावरण की समस्याएँ विश्व रूप धारण कर चुकी हैं ।यदि कोई भावनाओ के स्वाभाविक विषय के बजाय केवल सुखद भावनाओ पर ही जीवन निर्वाह करता है तो उसकी भावनात्मक हत्या हो जाती है ।सुख भावना पर ही जीवन निर्वाह करना सुख से वंचित होना है इसलिए गीता में भोग में त्याग और कर्म में अकर्म की बात कही गई है ।भारतीय ऋषि जीवन पर्यअंत लोककल्याणथॆ ही रहे हैं ।वे प्रकृति और समाज से कम लेते हैं और अधिक देते है ।ऐसे ऋषित्व की समाज को आवश्यकता है जो आरण्यक का आदर्श है ।

बहुत सुंदर । प्रकृति को बचाना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
वैश्विक सरकारों को सतत विकास को और अधिक मजबूत करना चाहिए
Very good
Nice
Very good
शानदार
Sustainable development should be utmost priority..
Kancreet ke jangle ne manavata ka vinash kar diya.
Nice
Really we should protect it
Very meaningful post
Excellent
Outstanding
Can I simply say what a comfort to discover somebody who truly understands what they are talking about on the internet. You actually know how to bring an issue to light and make it important. More people must look at this and understand this side of your story. I was surprised that you are not more popular because you definitely possess the gift.