स्त्री -2

हमारे वैदिक युग में स्त्री को उच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें पुरुषों की भाँति ही शिक्षा का अधिकार प्राप्त था, परन्तु उस समय में भी हमें एक भी स्त्री आचार्य का उल्लेख नहीं मिलता, बस कुछ एक विद्वान स्त्रियों के उदाहरण मिलते हैं, जैसे कि गार्गी ,आपाला,घोषा इत्यादि, साथ ही स्त्री शिक्षा के लिए किसी भी स्त्री गुरुकुल का भी उल्लेख नहीं मिलता है। जब कोई गुरुकुल था ही नहीं, तो स्त्री आचार्य कैसे होती? अतः हम कह सकते हैं कि प्राचीन काल से ही स्त्री पुरुष में भेदभाव होता रहा है। परन्तु आज आधुनिकता का दम भरने वाले युग में भी कमोवेश स्त्रियों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। अब प्रश्न यह है कि स्त्रियों की स्थिति में सुधार कैसे हो? इसको सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है? समाज की या स्वयं स्त्री की? जो स्वयं को अबला समझती है। स्त्री को दुर्गा, काली, त्रिलोचनकुटुम्बनी कहा जाता है, वह राक्षसों का नाश करती है, देवताओं की रक्षा करती है और धर्म स्थापित करती है। जिसको ब्रह्म भी नमन करतें हैं, विष्णु भी जिसका ध्यान करते है। वह जगदमाता है, परन्तु वह स्वयं की रक्षा करने में असमर्थ क्यों? समाज उन्हें सम्मान तो देता परन्तु एक मॅा के रूप में अर्थात् उसकी शक्तियॅा मातृत्व में ही निहित है, चाहे वह किसी पुरुष की माता हो या उसकी सन्तानों की परन्तु वह एक स्त्री रूप में क्यों नहीं? सम्भवत: दादा धर्माधिकारीजी ने ठीक ही कहा है-नियति ने और ईश्वर ने स्त्री के व्यक्तित्व में ताला लगा कर उसकी चाबी चुपचाप स्त्री के ही आंचल में बॅाध दी है। स्त्री खोयी-खोयी सी दुनिया भर में उस चाबी को खोज रही है। सब जगह सिवा अपनी अन्तरआत्मा के।

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Kumud Poorvi

कुमुद इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पुरा छात्रा हैं। एम.एड. की शैक्षिक योग्यता। अनेक पुस्तको
एवं लेखों का प्रणयन। पर्यावरणीय जागरूकता एवं ग्रामीण क्षेत्र मे गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा
के प्रचार में रत।

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