मनु ने कहा है कि,दस उपाध्यायों की अपेक्षा आचार्य श्रेष्ठ है। सौ आचार्यो की अपेक्षा पिता श्रेष्ठ है,और माता हजार पिताओ की अपेक्षा (प्रथम गुरु होने के कारण) श्रेष्ठ है।प्राचीनभारत में माता का स्थान ईश्वर के समकक्ष रखा गया है।स्त्री कोजो सम्मान एक माता के रूप में मिलता है, वही सम्मान एक पत्नी ,पुत्री एवम् बहन आदि के रूप में क्यों नहीं मिलता है? क्या स्त्री सिर्फ माता के रूप में ही पूज्यनीय है, या फिर स्त्री को सम्मान पाने के लिए मॉ का रूप ही धरना होगा। प्राचीन काल से लेकरआज के समय में स्त्री अपने सम्मान को पाने के लिए संघर्षरत है, परन्तु आज भी उसे वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार है। आज का समाज प्रगतिशील समाज है, आधुनिक सोच वाला है। परन्तु स्त्री के मामले में स्त्रियों को उतनी ही स्वतंत्रता है, जितनी आवश्यकता पुरुष को अपने जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए है। जैसे कि यदि स्त्री आत्मनिर्भर है और वह नौकरी करती है, तो उसे यह आजादी इसलिए है,किघर को या पति को अपना जीवनस्तर ऊँचा रखने के लिए धन की आवश्यकता है। ग्रामीण इलाकों में स्त्रियों को इसलिए शिक्षित किया जाने लगा कि शिक्षित लड़कियों का विवाह सरलता से हो जाएगा, इसलिए नहीं कि उन्हें भी शिक्षा का अधिकार है, और वे भी इस समाज का अभिन्न अंग हैं। क्रमश:……………

अत्यन्त प्रासंगिक विचार..
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नारी ईश्वर रचित अद्भुत कृति ।
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