जल जीवन का अमृत फल है सम्भवत: इसलिए हमारी भारतीय परम्परा में प्राचीन काल से ही जल संरक्षण किया जाता था, तथा कुएँ, तालाब आदि बनवाने को पुण्य का काम समझा जाता था। पुण्य का काम होने से लोग जल संरक्षण को एक आवश्यक धर्म समझते थे। इसका उदाहरण हमें मौर्य काल से ही मिलने लगता है, मौर्य काल में सुदर्शन नामक झील का उल्लेख मिलता है, जो कि सौराष्ट्र में स्थित थी समय-समय पर उसका जीर्णोद्धार विभिन्न राजवंशों द्वारा किया जाता रहा स्कन्दगुप्त के समय तक झील का उल्लेख मिलता है। सौराष्ट्र जहां आज भी पेयजल का संकट है सम्भवत :प्राचीन काल में भी रहा हो, जिससे राजा ने अपनी प्रजा की सुविधा हेतु इस झील का निर्माण कराया हो। हड़प्पा काल से ही हमें जल संरक्षण के साक्ष्य मिलने लागतें हैं, मोहनजोदड़ो में हर तीसरे घर में कुएँ के साक्ष्य मिलें है। इसी प्रकार बाढ़ से बचने के लिए धौलावीरा में पत्थरों से बाॉध बनाए जाने का साक्ष्य मिलता है तथा इस बाढ़ के जल को विभिन्न टैंकों में संरक्षित करके पूरे वर्ष सिंचाई आदि के कामों में प्रयोग में लाया था। गंगा जो कि उत्तर भारत की प्रमुख नदी है, इसमें भी बाढ़ के जल को एक नालिका द्वारा विभिन्न तालाबों गड्ढों आदि में संरक्षित किया जाता था, जिसके अवशेष आज भी श्रृगवेरपुर(इलाहाबाद) में मिलते हैं।
जब हमारे पूर्वज बिना किसी संसाधन या मशीनों के इतनी सूझबूझ के साथ पूरे वर्ष के जल का संरक्षण एवम् उपयोग कर सकते थे, तो क्या आज हम इस मशीनरी युग में इसको नहीं कर सकते?? क्या आधुनिकता और प्रगतिशीलता का अर्थ यह है कि, हम अपने भविष्य कि चिन्ता ही छोड़ दें आज इस आधुनिकता की दौड़ में सभी लोग विलासिता की सामग्री के संरक्षण में लगे हुए हैं, क्या हमने यह कभी सोच कि जब जीवन ही नही बचेगा तो इन सामग्री का क्या करेंगे?? अब वह समय आ गया है कि हम सबको एकजुट हो कर जल की एक एक बूंद का संरक्षण करना चाहिए नही तो आने वाले समय में पृथ्वी से जीवन का समापन हो जाएगा ।

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