संसार में अर्थ ही मुख्य पदार्थ है अर्थ के बिना मनुष्य अपने कर्तव्य पालन में असमर्थ हो जाता है ,फिर भला राज्य संचालन जैसा महान कार्य अर्थ के बिना कैसे संपन्न हो सकता है ।जब यह अर्थ राज्य संचालन हेतु संचित कर राज्य के अधीन संग्रहित किया जाता है तब यह कोष कहलाता है ।राज्य संचालन हेतु कौटिल्य ने कोष की आवश्यकता एवं उपयोगिता सर्वोपरि मानी है। उन्होंने राज्य के समस्त कार्यों का आरंभ कोष के ही आश्रित माना है ।कोष के द्वारा ही राजा को सेना की प्राप्ति होती है। कोष को भूषित करने वाली भूमि की प्राप्ति कोष और सेना के द्वारा ही होती है। इसलिए राजा को कोष का चिंतन सर्वप्रथम करना चाहिए। जिस राज्य का कोष अक्षुण्ण संपन्न रहता है ,उसराज्य की प्रजा समृद्धि एवं सुखी रहती है ।कोषकी उपयोगिता राज्य के लिए ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार मनुष्य के लिए अन्न और जल की, कोष की उपयोगिता के विषय में कई चिंतको ने अपने देश काल के अनुसार बताया है। बृहस्पति राज्यशास्त्र को अर्थ के अधीन ही रखना उचित मानते हैं ।उनके अनुसार इस जगती तल पर अर्थ ही प्रधान पदार्थ है। उनकी उपलब्धि पर ही अन्य पदार्थों की उपलब्धि संभव हो सकेगी। इसी प्रकार अन्य कई विचार को जैसे भीष्म ,कौटिल्य ,शुक्र आदि ने भी अर्थ को अपने समय अनुसार परिभाषित किया है। मनु के अनुसार राज्य संचालन महान कार्य है। इसके लिए अतुल धन की आवश्यकता होती है ,धन के बिना छोटे से छोटा कार्य भी नहीं हो सकता। फिर भला राज्य संचालन जैसा महान कार्य किस प्रकार संपन्न हो सकता है ।राज्य की इसी आवश्यकता के कारण प्राचीन भारतीय राजनीतिक प्रणेताओं ने सप्तांग राज्य का एक प्रधान अंग कोष माना है ।मनु ने भी राज्य के सात अंगों में कोष को भी एक अंग बतलाया है। जिसकी वृद्धि के लिए राजा को निरंतर प्रयत्नशील होना चाहिए। राज्य संचालन हेतु कोषवृद्धि होनी चाहिए, परंतु कोष वृद्धि प्रजा से कर के रूप में अर्थ संचय द्वारा होती है ।इसलिए राजकोष की वृद्धि हेतु प्रजा से अर्थ संचय करना राजा का एक प्रधान कर्तव्य होता है। परंतु राजा को अपने इस कर्तव्य का पालन निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर करना चाहिए।
