सनातन जीवन शैली

अपने यात्रापथ में संचरणशील मानव जिस सत्य का दशॆन करता है ।जिस सत्य का प्रयोग करता है वही उसका यथार्थ स्वरूप है ।वह अपने देश काल की सीमाओ से सीमित पूणॆता की केवल कल्पना कर पाता है उसकी उपलब्धि नहीं ।साथ ही मानवगत दुबॆलताएं तथा उसके परिणाम भी उसके साथ रहते हैं ।इस प्रकार वह अपने जीवन में एक प्रकार की त्रुटि या अभाव का अनुभव करता है ।आदॆश इन अभावों को पूणॆ करने का प्रयत्न उपस्थित करता है ।फलतः जीवन में एक गति विशेष उत्पन्न होती है जो अपनी मोहकला में आकषण में एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करती है और मानव उसो वातावरण में पहुंच कर अपने अभावों को जाता है ।अतएव जीवन हेतु आदशॆ उतना ही आवश्यक है जितना कि यथार्थ ।जीवन की सार्थकता यथार्थ और आदर्श के मिश्रण से ही संभव है ।

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Kumud Poorvi

कुमुद इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पुरा छात्रा हैं। एम.एड. की शैक्षिक योग्यता। अनेक पुस्तको
एवं लेखों का प्रणयन। पर्यावरणीय जागरूकता एवं ग्रामीण क्षेत्र मे गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा
के प्रचार में रत।

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