सौंदर्य प्रसाधन का प्रयोग अति प्राचीन है। सभी प्राचीन संस्कृतियों में सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग किया जाता था। प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर गुप्त तक यह कैनवास नए आयाम प्राप्त करता रहा। गुप्तकालीन रूप सज्जा एवं अलंकरण पर कालिदास का साहित्य प्रभावी चित्रण करता है। स्त्री पुरुष दोनों अलंकरण प्रेमी थे स्त्रियां सुगंधी तेल से बालों को सुवाषित करती थी अगर तगर को जलाकर उसके धुएं से भी बालों को सुगंधित बनाती थी। सामान्यतः स्नान के पूर्व स्त्री पुरुष दोनों अपने शरीर की मालिश तेल और उबटन से करते थे। बालों और त्वचा की नमी को बनाए रखने के लिए सुगंधित तेल का प्रयोग किया जाता था। सामान्य सुगंधित तेल शीशम के तेल और सुगंधित फूलों से बनाया जाता था। चेहरों पर लगाने के लिए चंदन की लकड़ी का पेस्ट प्रयोग किया जाता था। जिससे चेहरे पर कांति आती थी। काजल का प्रयोग स्त्रियां अपने आंखों को सजाने के लिए करती थी, तथा आंख के आकार को बड़ा दिखाने के लिए उसे कोरो की तरफ बढ़ाकर लगती थी। काजल को बनाने के लिए घी अथवा तेल में बत्ती डालकर जलाते थे, लौंग, इलाइची, जड़ी बूटियां डालकर कांसे या पीतल के बर्तन पर फेंटते थे जिससे कार्बन के कण घुल मिल जाए और आंखों में लगाने पर शीतलता का अनुभव हो। इस प्रकार के काजल के प्रयोग से आंखों संबंधी बीमारियां भी कम होती थी। होठों को गुलाबी रंग से रंगने के लिए लाख में कई प्रकार के पत्थरों के पाउडर को मिलाकर प्रयोग किया जाता था। लिपस्टिक का एक उदाहरण हमें सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों में भी मिला है। भारतीय सौंदर्य प्रसाधन में लोध्र रेणु, चंदन चूर्ण, कुमकुम चूर्ण प्रचलित थे। भारतीय सौंदर्य प्रसाधन में एक विशिष्टता जिसका उल्लेख किया जाना महत्वपूर्ण है वह यह है कि, समकालीन सभ्यता में जहां रक्त, मज्जा अस्थि आदि का प्रयोग करके सौंदर्य प्रसाधन तैयार किए जाते थे। वहीं भारतीय प्रसाधन अहिंसक एवं इको फ्रेंडली थे। चीन में त्वचा की रेशमी कांतिमय लालिमायुक्त बनाए रखने के लिए खरगोश के खून से स्नान करने की परंपरा थी तथा लिपस्टिक के लिए लाल चीटियों का पाउडर बनाकर प्रयोग में लाया जाता था। आज उनका स्थान टेलकॉम पाउडर ने ले लिया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारतीय सदैव से प्रकृति के रक्षक रहे हैं।

They can be quite irritating to the throat if they get stuck priligy cvs