प्राचीन काल से ही भारतीय मनुष्य सौंदर्य प्रेमी रहा है। प्रत्येक स्त्री पुरुष अपने शरीर को सुंदर और आकर्षक बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के वस्त्रों के अतिरिक्त आभूषण का भी प्रयोग करते थे।
मनुष्य की यह सौंदर्य प्रियता प्राग्वैदिक काल से ही रही है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के लोग मनके और ताबीज पहनता थे, जो सीप से बने होते थे। लेकिन धनिको के आभूषण सोने और चांदी के बने होते थे। ऋग्वेद से विदित होता है कि स्त्री और पुरुष दोनों स्वर्ण और रजत से बने आभूषणों में समान रुचि रखते थे। दोनों अनेक प्रकार के आभूषण पहनते थे जिसमें रत्न जुड़े होते थे कानों में करण शोभन गले में निष्क नामक आभूषण धारण करते थे। आर्य स्त्रियां शीश पर कुंभ नामक आभूषण पहनती थी जो आजकल के मांग टीका के समान होता है। आभूषणों में कृश्न (मोती) तथा अनेक धातुओं का भी प्रयोग होने लगा था। आभूषणों में प्रायःस्वर्ण और रजत का ही उपयोग किया जाता था। उस युग के लोग चांदी के भी आभूषण पहनते थे। आभूषण प्रायः स्वर्ण को गला कर बनाया जाता था। स्वर्ण आभूषणों में प्रयुक्त होने वाली प्रमुख धातु था। भुज,केयूर, नूपुर, भुजबंद, कंकर, मुद्रिका आदि आभूषण स्त्रियां भी पहनती थी। वह हाथों में कड़े और पैरों में खादि का प्रयोग करती थी। सभी स्त्री पुरुष अपने वक्षों को रुक्म नामक आभूषण से सुशोभित करते थे। गले में प्रायः मणियं भी धारण की जाती थी।
