पिछले साल गांव जाना हुआ ।जाना तो अक्सर होता है ,लेकिन पिछली बार लोगों के बीच सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराने पर पता चला कि पिछले दो दशक में परिवर्तन की जो गति रही है ,वह आजादी के लगभग 50 वर्षों में नहीं रही है। गांव जहां सड़कों से जुड़े हैं वही गलियां स्लम हो गई हैं ।मेरी याद में गांव की पगडंडी वाली गलियां जो बिल्कुल साफ-सुथरी और कई बार तो गोबर से लिपी हुई अल्पना युक्त दिखती थी जिन पर खड़े होकर घर गांव और जहान की पूरी चर्चा हो जाया करती थी ,बड़के गिलास में चाह पूरी मिठास के साथ उपस्थित होता था तो मही की महक भी माठे के रूप में ताजगी प्रदान करती थी ।तात्पर्य आत्मीयता की प्रगाढ़ता ।गांव आज भी वही है बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं कुछ घरों के सामने कुछ बच्चे ,एक के पढ़ोह का पानी दूसरे के दरवाजे को द्रवित कररहा है। कृषि जोत छोटे होने से कृषि के प्रति कम लगाव ,काजी हाउस के लुप्त होने से पशुओं का उधम तथा नष्ट होती फसलें, ताक से गायब लाल कपड़े में लिपटी मानस यह सोचने को बाध्य करते हैं कि कहीं हमारे मन के गांव जिनमें तरलता है संबंधों की उष्णता है ,भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध श्रद्धा है कर्म योग का मार्ग है प्राणियों के प्रति सद्भावना है सत्य और राष्ट्र के लिए जीने का जज्बा है लुप्त हो रहा है ।एक महत्वपूर्ण बात की ओर और ध्यान जाता है वह यह कि सनातन धर्म के मानने वालों की हस्ती इसलिए भी नहीं मिटी क्योंकि वह ग्रामीण प्रकृति की है। इस तरह ग्रामीण विकास ना केवल आर्थिक अवधारणा है बल्कि सामाजिक ,पर्यावरणीय और सांस्कृतिक अवधारणा भी है ,जो कालजई संस्कृति का निर्माण करती है जो हमारे गौरव बोध का आधार है। इसीलिए मेरा गांव मेरी पहचान।

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